मेरे ब्लॉग के किसी भी लेख को कहीं भी इस्तमाल करने से पहले मुझ से पूछना जरुरी हैं

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September 04, 2015

कौन किसके बारे में कितना सोचता हैं इसकी इकोनॉमिक्स बहुत काम्प्लेक्स हैं

आज कल तमाम रिफ्यूजी समस्या चर्चा में हैं।  कुछ दिन पहले रवांडा रिफ्यूजी चर्चा मे थे आज कल सीरिया के हैं।  

लोग यूरोप पर थूक रहे हैं क्युकी उन्होने इनलोगो को शरण नहीं दी।  

हमलोगो के आस पास कितने हमारे अपने आर्थिक रूप से कमजोर रिश्तेदार परिवार हैं क्या हम सब उनको आर्थिक रूप से कमजोर होने के कारण अपने घर में ले आते हैं ?

क्या हम सब अपनी आर्थिक क्षमता का आंकलन नहीं करते हैं ?

कितने बांग्ला देशी कितने साल तक हमारे देश में रहे और आज भी हैं क्या उस से देश की इकॉनमी पर कोई असर नहीं पड़ा ? 

यूरोप मे खुद बहुत से ऐसे देश हैं जो इस समय रिसेशन का शिकार हैं तो अगर यूरोप नहीं चाहता की बाहर के लोग आकर उनकी इकॉनमी पर और बोझ डाले तो इसमे क्या गलत हैं ? 

कभी कभी सोचो तो लगता हैं जो लोग इललीगल तरीके   से जीवन यापन करते हैं उन्हे ही दूसरो  से सबसे ज्यादा चाहिये होता हैं 

आज कल जो  स्त्री मेरे ऑफिस में झाड़ू पोछा करती हैं वो एक महिने पहले दिल्ली आयी हैं , इस काम को वो बेहद बेमन से करती हैं।  
कल उससे बात की तो पता लगा गाँव में एक जमीन ली हैं कर्जा उठाया हैं १ लाख का चुकाना हैं।  

मैने कहा इसका मतलब हैं की कम  से कम २० हज़ार रूपए महीने की कमाई हो तो १० हज़ार गाँव भेज कर तुम बाकी दस हज़ार में खुद पति और ३ बच्चो के साथ यहां गुजारा कर सकती हो।  कहने लगी इतना तो नहीं हो सकता।  मुश्किल से १०००० हो पाता हैं जिसमे ३ हज़ार  एक दस साल का उसका लड़का कमाता हैं।  रोज का ४ समय का पूरा भोजन भी नहीं सही मिलता। 

गाँव में ससुर का १० कमरो का मकान हैं ३ बेटो के ३ ३ कमरे।  ३ परिवार साथ रह रहे थे।  दिन में आराम था किसी के घर नहीं जाना होता था।  

यहां शहर के लोग बहुत काम लेते हैं पैसा कम देते हैं। 

अब शहर के लोग कैसे अपना जीवन यापन करते हैं , कैसे अपने बच्चो की ३००० - ८००० रूपए महीने की स्कूल फीस देते हैं इस सब से उनको क्या।  

उनके  बारे में कोई नहीं सोचता।  

कौन किसके बारे में कितना सोचता हैं इसकी इकोनॉमिक्स बहुत काम्प्लेक्स हैं

May 07, 2015

कानून को इम्पार्शिअल बनाना जरुरी हैं

अमीरो के लिये कानून ,गरीबो के लिये कानून ,इतना फरक क्यों हैं।  सलमान खान ने शराब पीकर गाडी चलाई ,गाड़ी पर काबू नहीं रहा , गाड़ी एक फुटपाथ  पर चढ़ गयी , फुटपाथ पर कुछ लोग सो रहे थे , कार के नीचे आने से उनकी जान चली गयी।  बहुत अफ़सोस हुआ था ये सब जान कर।
१३ साल केस चला फैसला में सलमान को ५ साल की सजा हुई , सही हुआ।

लेकिन
क्या सलमान का जुर्म क्या हैं ये नहीं समझ आया जो पहले समझ आ रहा था

क्या सलमान का जुर्म ये हैं की उनके पास गाड़ी चलाने का लाइसेंस नहीं था
अगर हाँ तो कानून में इसके लिये क्या ५ साल की सजा हैं ? क्या जितने लोग बिना लाइसेंस के गाड़ी चलाते हैं उनको ये सजा दी जाती हैं 

क्या सलमान का जुर्म ये हैं की उन्होंने शराब पीकर गाड़ी चलायी ?
अगर हाँ तो कानून में इसके लिये क्या ५ साल की सजा हैं ? क्या जितने लोग शराब  पीकर गाड़ी चलाते हैं उनको ये सजा दी जाती हैं

क्या सलमान का जुर्म ये हैं उनकी गाड़ी फुटपाथ पर चढ़ गयी ?
अगर हाँ तो कानून में इसके लिये क्या ५ साल की सजा हैं ? क्या  लोग गाड़ी पर बॅलेन्स खराब होने के बाद उसको सबसे पहले कहीं ना कहीं ऐसी जगह टकराते नहीं हैं जहां गाड़ी की स्पीड कम की जा सके या रोका जा सके ? क्या उन सब को ५ साल की सजा दी जाती हैं



सलमान की गाड़ी के नीचे कुछ लोग आगये जो वहाँ एक बैकरी के सामने सो रहे थे
क्या ये सही था , क्या फुटपाथ पर सोना कानूनन  सही हैं ?
लॉजिक वो गरीब थे
क्या किसी के इकनोमिक स्टेटस के लिये सलमान दोषी हैं ?
अगर वो बैकरी में काम करने वाले लोग थे तो क्या बैकरी के मालिक ने उनको वहाँ सोने की परमिशन दी थी ताकि उनकी बैकरी सेफ रहे ?


मुंबई नगर पालिका के कर्मचारी के लिये क्या कानून हैं ?  क्या उनकी ड्यूटी नहीं थी की रात में लोगो को फुटपाथ पर सोने से रोके

दिल्ली और तमाम अन्य शहरों मे सुबह शाम रात फुटपाथ पर दुकाने लगी रहती हैं , लोगो की झुगिया बन जाती हैं , दिन में लोहार वहाँ बैठ कर लोहा पीट पीट कर औजार बनाते हैं रात को वही खाना बनता हैं और कोई कानून नहीं हैं उनको हटाने के लिये क्युकी वो गरीब हैं

हर इस तबके  के गरीब के घर की मासिक आय इतनी है वो आराम से १५०० - २००० रुपया का कमरा { आज का रेट } मासिक किराय पर ले सकता हैं , नहीं लेता क्युकी जो काम फ्री में हो सकता हैं तो क्यों किया जाए.

आज जो सलमान के लिये फैसला आया हैं किसी ना किसी दिन हम सब के किसी नजदीकी के लिये भी आएगा इस लिये नहीं की वो दोषी हैं बल्कि इस लिये क्युकी उसका इकोनोमिक स्टैण्डर्ड ज्यादा हैं।

जो उस समय १. ५ लाख का कम्पेन्सेशन पा चुके हैं वो बड़े निराश हैं इस फैसले से।  उनके हिसाब से अगर सजा सलमान को होती हैं और उनको अब कोई कम्पेन्सेशन नहीं दिया जाता हैं तो उन्हे क्या फायदा हुआ ?

अब केस सलमान को सजा दिलवाने के लिया था या घायल को कम्पेन्सेशन ?

सलमान के बिगड़े हुए रईस हैं और उनको सजा देना जरुरी हैं पर सजा उन सब भी मिले जो राइस / अमीर नहीं हैं लेकिन कानून का उलंघन तो उन्होंने भी किया हैं।

कानून को इम्पार्शिअल बनाना जरुरी हैं




April 16, 2015

कानून को बदलने की प्रक्रिया होती हैं जो केवल संवेदना आधारित नहीं हो सकती हैं

अर्णव गोस्वामी जैसे लोग जो टाइम्स नाउ पर # लगा कर बेफिजूल मुद्दो को उठाते हैं वो पत्रकार हैं ही नहीं।  कभी भी उनका चेंनेल देखो केवल उनका ही पक्ष सुनाई देता हैं और दूसरा कोई अपना पक्ष नहीं रख पता हैं ब्रेकिंग न्यूज़ के नाम पर हर बात को ले कर हल्ला मचाना और अपने को बेस्ट न्यूज़ चैनल बताना उनकी जरुरत हैं ताकि उनके कारोबार के लिये उनको विज्ञापन मिल सके। 
भारतीये वैसे भी हमेशा से सिम्पथी सीकर और गिवर रहे हैं इस लिये बिना कानून जाने हर मुद्दे पर ढेरो पोस्ट फेसबुक और अन्य सोशल मीडिया पर रोज दिखती हैं।
किसी भी समाचार को पोस्ट करने से पहले और किसी कानून की धज्जिया उड़ाने से पहले एक बार नेट पर उस से जुड़ी और जानकारी अगर हम देख ले तो बेहतर होगा।
कानून को बदलने की प्रक्रिया होती हैं जो केवल संवेदना आधारित नहीं हो सकती हैं हाँ संवेदना उसका एक आधार हो सकती हैं

January 23, 2015

बदलाव तभी संभव हैं जब आप बदलाव को समझे और स्वीकार भी करे

ना जाने क्यों लोग आज कल किसी व्यक्ति के पार्टी बदलने से उसके पुराने ब्यान पर संवाद कर रहे है। 
क्या एक बदलाव नहीं दिख रहा हैं हमे अपने देश की राज नैतिक व्यवस्था मे। 
अब प्रोफेशनल लोग हैं  जिनके लिये पार्टी महज एक नौकरी की तरह हैं जहां अगर वो परफॉर्म नहीं कर पाते हैं तो उसको बदल कर दूसरी पार्टी / नौकरी को ज्वाइन कर लेते हैं और अपनी क्षमता का पुनः आकलन करवाते है
फिर वो चाहे किरण बेदी हो या अरविन्द केजरी वाल।  दोनों को समझ आगया की दोनों की एम्बिशन दिल्ली का मुख्य मंत्री बनना हैं।  एक पार्टी मे रह कर दोनों नहीं बन सकते तो इस लिये किरण बेदी ने आप पार्टी ज्वाइन नहीं की। 
इतनी सिंपल बात हम क्यों नहीं समझ पाते क्युकी हम सब कहीं ना कहीं परिवार वाद को बहुत महत्व देते हैं।  हमारे लिये वो सबसे अच्छा होता हैं जो बंधी बंधाई लीक पर चलता हैं।  जहां कोई भी नया कुछ करता हैं जरुरी होता हैं की उस को ठोंक पीट कर व्यवस्थित हम कर दे। 
बदलाव तभी संभव हैं जब आप बदलाव को समझे और स्वीकार भी करे