Till the time rape is declared as "rarest of rare crime " no change will come . its not about culture and its not about clothes and also not about west effect its only a tool to prove that woman should be punished with rape it they dont do what "she is expected to do " now what is she expected to do , indian man and also else where think she is expected to be available always for the lust of man and any woman who does not confer to this should be "raped " sometimes physically and sometime "verbally " . STOP jokes on woman , STOP making woman a object . Be a role model for others and system will change
सच बोलना जितना मुश्किल है , सच को स्वीकारना उस से भी ज्यादा मुश्किल है . लेकिन सच ही शाश्वत है और रहेगा मुझे अपने सच पर उतना ही अभिमान है जितना किसी को अपने झूठ से होने वाले फायदे पर होता हैं
मेरे ब्लॉग के किसी भी लेख को कहीं भी इस्तमाल करने से पहले मुझ से पूछना जरुरी हैं
मेरे ब्लॉग के किसी भी लेख को कहीं भी इस्तमाल करने से पहले मुझ से पूछना जरुरी हैं
December 24, 2015
December 19, 2015
तब चलेगये और बोले क्रेन ले कर हम बूथ हटा रहे हैं और अब बूथ हट गया।
दिवाली के आस पास दिल्ली ट्रैफिक पोलिस ने अपना बूथ हमारे फ्लैट के सामने फुट पाथ पर खड़ा खड़ा कर दिया। वहां बैठे कांस्टेबल से कहा तो बोले इस से आप को क्या फरक पड़ेगा। ये कहने पर की आप जब चालान करते हैं तो लोग यहां मजमा लगाते हैं और अंदर तक आवाजे आती हैं। इसके अलावा फुट पाथ पर आप कैसे बूथ बना सकते हैं।
कोई जवाब नहीं मिला हां बूथ हटा भी नहीं। और ये कहा गया मैडम अब आप के यहां चोरी नहीं हो सकती। मैने कहा आप ट्रैफिक पोलिस में हो अंदर का कुछ भी आप के अंडर में नहीं आता तो चले गए।
आर डब्लू ऐ से कहा तो बोले मैडम ये सरकारी लोग हैं हम क्या कर सकते हैं।
उसके बाद मैने ट्विटर पर { Shivam Misra शिवम मिश्रा थैंक यू ट्विटर सिखाने के लिए } दिल्ली ट्रैफिक पोलिस को कंप्लेंट की फोटो के साथ जवाब आया कंप्लेंट आगे पास कर दी गयी।
दूसरे दिन , तीसरे दिन पीएमओ के ट्विटर अकाउंट के साथ कंप्लेंट की तो एक फाइल संख्या दे दी गयी। बूथ वहीँ का वहीं , उसके साथ ५ -५ बाइक भी खड़ी होने लगी।
कोई जवाब नहीं मिला हां बूथ हटा भी नहीं। और ये कहा गया मैडम अब आप के यहां चोरी नहीं हो सकती। मैने कहा आप ट्रैफिक पोलिस में हो अंदर का कुछ भी आप के अंडर में नहीं आता तो चले गए।
आर डब्लू ऐ से कहा तो बोले मैडम ये सरकारी लोग हैं हम क्या कर सकते हैं।
उसके बाद मैने ट्विटर पर { Shivam Misra शिवम मिश्रा थैंक यू ट्विटर सिखाने के लिए } दिल्ली ट्रैफिक पोलिस को कंप्लेंट की फोटो के साथ जवाब आया कंप्लेंट आगे पास कर दी गयी।
दूसरे दिन , तीसरे दिन पीएमओ के ट्विटर अकाउंट के साथ कंप्लेंट की तो एक फाइल संख्या दे दी गयी। बूथ वहीँ का वहीं , उसके साथ ५ -५ बाइक भी खड़ी होने लगी।
फिर LG की लिसनिंग पोस्ट पर कंप्लेंट की फोटो के साथ , फिर ईमेल आयी मेल दिल्ली पोलिस forward की गयी हैं
बूथ वहीँ का वही
बूथ वहीँ का वही
तीन दिन बाद फिर ईमेल किया
तीन बाद फिर पी एम ओ की ऑफिसियल कंप्लेंट साइट पर कम्प्लेंट की
तीन बाद फिर पी एम ओ की ऑफिसियल कंप्लेंट साइट पर कम्प्लेंट की
एक दिन बाद जवाब आया आप की कंप्लेंट फॉरवर्ड कर दी हैं
मैंने जवाब में लिखा की हर जगह से केवल फॉरवर्ड की जा रही हैं कोई हैं जो इस पर कार्यवाही करेगा या डिजिटल इंडिया बस एक शगूफा हैं
फिर एक नंबर दिया उस पर फ़ोन किया तो अधिकारी के पी ऐ जी बोले साहब मीटिंग में हैं आप नंबर दे दो मोबाइल।
मैने कहा नहीं मे अपना नंबर नहीं दूंगी आप अधिकारी का नंबर दो बोले क्यों नंबर देने में क्या हैं ?
मैने कहा आप किसी भी लेडी / महिला से उसका मोबाइल नंबर नहीं मांग सकते क्युकी इस से वो unsafe होती हैं और ये कानून कहता हैं। फिर जा कर अधिकारी का नंबर मिला।
बहुत अच्छी तरह बात की अपना ईमेल आईईडी दिया सारी फोटो मंगवाई।
मैंने जवाब में लिखा की हर जगह से केवल फॉरवर्ड की जा रही हैं कोई हैं जो इस पर कार्यवाही करेगा या डिजिटल इंडिया बस एक शगूफा हैं
फिर एक नंबर दिया उस पर फ़ोन किया तो अधिकारी के पी ऐ जी बोले साहब मीटिंग में हैं आप नंबर दे दो मोबाइल।
मैने कहा नहीं मे अपना नंबर नहीं दूंगी आप अधिकारी का नंबर दो बोले क्यों नंबर देने में क्या हैं ?
मैने कहा आप किसी भी लेडी / महिला से उसका मोबाइल नंबर नहीं मांग सकते क्युकी इस से वो unsafe होती हैं और ये कानून कहता हैं। फिर जा कर अधिकारी का नंबर मिला।
बहुत अच्छी तरह बात की अपना ईमेल आईईडी दिया सारी फोटो मंगवाई।
आज १ महीने बाद २ ट्रैफिक पोलिस वाले आये की आप ने कंप्लेंट की थी आप को तकलीफ नहीं होगी बूथ लगा रहने दे कुछ दिन बाद जगह देख कर हटा लगे। हम जानते हैं आप वकील हैं। मैने कहा भाई ना तो मै वकील हूँ , ना मेरे पीछे कोई आदमी खड़ा हैं , ना मेरा किसी नेता से कोई लेना देना हैं , मेरे साथ तो एसोसिएशन भी नहीं हैं। एक लॉ अबाइडिंग सिटीजन हूँ और जो संभव होगा इस बूथ को हटवाने के लिये करुँगी।
तब चलेगये और बोले क्रेन ले कर हम बूथ हटा रहे हैं और अब बूथ हट गया।
September 16, 2015
उस वृद्ध व्यक्ति ने किया अपने को सम्मान देने वाले व्यक्ति का सम्मान .
दो दिन से एक फोटो को सब शेयर कर रहे हैं जिस मे एक वृद्ध व्यक्ति अखिलेश यादव के पैर छू रहा हैं। उस व्यक्ति को साहित्यकार होने का कोई पुरूस्कार मिला हैं।
हिंदी में पुरूस्कार की परम्परा बहुत पुरानी हैं जैसे हमारी संस्कृति मे पैर छूने की।
अगर किसी को किसी के प्रति कोई ऐसी भावना हैं और उसने पैर छू लिये तो इसमे इतना बाय बावेला क्यों ?
किसी को सारी जिंदगी कुछ नहीं दिया गया और मरने से पहले उसके काम को सराहना मिली और साथ साथ साथ पुरूस्कार भी और उसने अपने चीफ मिनिस्टर के चरण स्पर्श कर लिये तो क्या आफत आगयी ?
बुरा तो तब होता अगर अखिलेश के हाथ उनको उठाने के लिये तत्पर ना होते।
विनम्रता पुरानी पीढ़ी की ताकत थी वो अपने साथ हुए अन्याय के खिलाफ आवाज नहीं उठाते थे लेकिन अपनी सराहना होते ही वो भावनात्मक रूप से किसी के भी पैर छू सकते थे.
हिंदी ब्लॉग जगत में तो एक पुरूस्कार की घोषणा होते हैं उसके चित्र लिंक और जिसने पुरूस्कार दिया उसकी तारीफ़ से भरे पुलिँदै ना जा ने कितनो ने डाले हैं। वो सब इस पैर छूने से कहीं ज्यादा भयानक चाटुकारिता थी।
आज भी फेस बुक पर गौरव सम्मान के लिंक दिख रहे हैं क्या हैं ये सब वही जो उस वृद्ध व्यक्ति ने किया अपने को सम्मान देने वाले व्यक्ति का सम्मान .
September 10, 2015
हिंदी को प्यार इसलिये ना करे की वो आप को पॉपुलर कर सकती हैं क्युकी ये सेल्फिशनेस हुई।
हिंदी सम्मलेन हो रहा हैं फेसबुक पर और ब्लॉग पर हिंदी में लिखने वाले परेशान , उन्हे नहीं न्योता गया।
अरे क्या आप ने ब्लॉग और फेसबुक पर हिंदी में इसलिये लिखना प्रारंभ किया था की आप हिंदी के स्थापित लेखक और कवि या व्यंगकार कहलाये ?
जो इतने व्यथित दिख रहे हैं उन सब को सोचना चाहिये की क्या उनके पास हिंदी की कोई प्रमाणित डिग्री हैं जैसे बी ऐ , ऍम ऐ , ऍम फिल , पी एच डी। अगर हैं तो क्या आप उन संस्थानों से जुड़े हैं जहां साहित्यकार , हिंदी के लेखक , कॉलेज प्रवक्ता इत्यादि जाते हैं ?
लीजिये आप कहेंगे वहाँ सब बेकार की बाते होती हैं , बहुत पॉलिटिक्स हैं और हिंदी को प्यार करने उसमे लिखने के लिये इस सब की क्या जरुरत।
सही आप हिंदी को प्यार करते हैं , उसमे लिखते हैं लिखिये खुश होइए और साहित्यकार , बुद्धीजीवियों की जुत्तम पैजार से दूर रहिये।
और मन में ये भरम तो कभी ना पालिये की आप के हिंदी में लिखने से हिंदी का इतना विस्तार हुआ हैं नेट पर।
हिंदी अपने आप में एक सम्पूर्ण भाषा हैं जिसको विस्तार की जरुरत ही नहीं हैं। आप उसे प्यार करिये और उसके साथ साथ ये भी ध्यान रखिये की कोई भी भाषा हो नेट पर उसका विस्तार केवल और केवल इंग्लिश के कारण हुआ हैं।
सारे प्रारंभिक टूल्स इंग्लिश में थे जिनकी जानकारी के कारण आलोक , मैथिलि , सिरिल और रवि इत्यादि ने हिंदी में नेट पर लिखना शुरू किया। बाकी सब धीरे धीरे आते गए , कारवाँ बनता गया।
हिंदी को प्यार इसलिये ना करे की वो आप को पॉपुलर कर सकती हैं क्युकी ये सेल्फिशनेस हुई।
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