मेरे ब्लॉग के किसी भी लेख को कहीं भी इस्तमाल करने से पहले मुझ से पूछना जरुरी हैं

मेरे ब्लॉग के किसी भी लेख को कहीं भी इस्तमाल करने से पहले मुझ से पूछना जरुरी हैं

April 16, 2015

कानून को बदलने की प्रक्रिया होती हैं जो केवल संवेदना आधारित नहीं हो सकती हैं

अर्णव गोस्वामी जैसे लोग जो टाइम्स नाउ पर # लगा कर बेफिजूल मुद्दो को उठाते हैं वो पत्रकार हैं ही नहीं।  कभी भी उनका चेंनेल देखो केवल उनका ही पक्ष सुनाई देता हैं और दूसरा कोई अपना पक्ष नहीं रख पता हैं ब्रेकिंग न्यूज़ के नाम पर हर बात को ले कर हल्ला मचाना और अपने को बेस्ट न्यूज़ चैनल बताना उनकी जरुरत हैं ताकि उनके कारोबार के लिये उनको विज्ञापन मिल सके। 
भारतीये वैसे भी हमेशा से सिम्पथी सीकर और गिवर रहे हैं इस लिये बिना कानून जाने हर मुद्दे पर ढेरो पोस्ट फेसबुक और अन्य सोशल मीडिया पर रोज दिखती हैं।
किसी भी समाचार को पोस्ट करने से पहले और किसी कानून की धज्जिया उड़ाने से पहले एक बार नेट पर उस से जुड़ी और जानकारी अगर हम देख ले तो बेहतर होगा।
कानून को बदलने की प्रक्रिया होती हैं जो केवल संवेदना आधारित नहीं हो सकती हैं हाँ संवेदना उसका एक आधार हो सकती हैं

January 23, 2015

बदलाव तभी संभव हैं जब आप बदलाव को समझे और स्वीकार भी करे

ना जाने क्यों लोग आज कल किसी व्यक्ति के पार्टी बदलने से उसके पुराने ब्यान पर संवाद कर रहे है। 
क्या एक बदलाव नहीं दिख रहा हैं हमे अपने देश की राज नैतिक व्यवस्था मे। 
अब प्रोफेशनल लोग हैं  जिनके लिये पार्टी महज एक नौकरी की तरह हैं जहां अगर वो परफॉर्म नहीं कर पाते हैं तो उसको बदल कर दूसरी पार्टी / नौकरी को ज्वाइन कर लेते हैं और अपनी क्षमता का पुनः आकलन करवाते है
फिर वो चाहे किरण बेदी हो या अरविन्द केजरी वाल।  दोनों को समझ आगया की दोनों की एम्बिशन दिल्ली का मुख्य मंत्री बनना हैं।  एक पार्टी मे रह कर दोनों नहीं बन सकते तो इस लिये किरण बेदी ने आप पार्टी ज्वाइन नहीं की। 
इतनी सिंपल बात हम क्यों नहीं समझ पाते क्युकी हम सब कहीं ना कहीं परिवार वाद को बहुत महत्व देते हैं।  हमारे लिये वो सबसे अच्छा होता हैं जो बंधी बंधाई लीक पर चलता हैं।  जहां कोई भी नया कुछ करता हैं जरुरी होता हैं की उस को ठोंक पीट कर व्यवस्थित हम कर दे। 
बदलाव तभी संभव हैं जब आप बदलाव को समझे और स्वीकार भी करे

August 09, 2014

हिंदी माध्यम से पढ़ने वाले इंग्लिश माध्यम से पढ़ने वालो से लड़ रहे हैं लेकिन हिंदी को हर राज्य में राष्ट्र भाषा का दर्जा प्राप्त हो इसकी लड़ाई कौन लड़ेगा ?

हिंदी भाषा देश की भाषा हैं यानी हमारी "नेशनल लैंग्वेज" . लेकिन आज भी हिंदी पूरे देश में नहीं बोली जाती हैं
क्यों देश के हर राज्य में हिंदी नहीं पढ़ाई जाती हैं।  हिंदी को पढ़ना या ना पढ़ना वैकल्पिक क्यों हैं , जरुरी क्यों नहीं ?

आज़ादी के इतने साल बाद भी हम राज्यों में बांटे जा चुके हैं।  हर राज्य की अपनी भाषा हैं लेकिन राष्ट्र भाषा का ज्ञान नहीं हैं क्युकी मानना हैं की बोल चाल की भाषा जरुरी हैं हिंदी जरुरी  नहीं हैं।

अभी हिंदी को लेकर यु पी एस सी के इम्तिहान को लेकर काफी बवाल हुआ , अंत में इंग्लिश के नम्बर मेरिट में नहीं जोड़े जायेगे ऐसा निर्णय हुआ और उसके साथ ही पेपर को अलग अलग भाषाओ में बनाने  की बात होने लगी।


इसका  तो सीधा मतलब यही हुआ की अगर कोई बंगाल से हैं , और बंगला भाषा में अपना पेपर लिखता हैं तो उसकी नियुक्ति भी बंगाल में ही  होगी क्युकी उसके पास कोई भी कॉमन लैंग्वेज नहीं हैं जिसके कारण वो अन्य प्रांतो में काम कर सके।

अभी कॉमन भाषा का विकल्प इंग्लिश हैं।  होना हिंदी को चाहिये था पर हैं नहीं और ना ही सब राज्य इसको मानने को तैयार होंगे।

प्रधानमंत्री  ने कहा हैं वो सब जगह हिंदी में बोलेगे , चलिये उनको सुनने के लिये उत्सुक लोग ट्रांसलेटर की सुविधा रखते हैं { यानी दूसरे राष्ट्र के अधिकारी गण } पर हमारी प्रशासनिक सेवा अधिकारी जब अपने प्रान्त की जगह दूसरी जगह जायेगे तो किसी प्रकार  बात कर सकेंगे।  क्या बंगाल निवासी , ओरिसा में बंगाली में बोलेगा या ओरिया बोलेगा क्युकी दोनों को ही हिंदी और इंग्लिश नहीं आती होगी या आती भी होगी तो भी वो बोलेगे नहीं।  क्या इन सब को भी ट्रांसलेटर की सुविधा होगी।


हिंदी माध्यम से पढ़ने वाले इंग्लिश माध्यम से पढ़ने वालो से लड़ रहे हैं लेकिन हिंदी को हर राज्य में राष्ट्र भाषा का दर्जा प्राप्त हो इसकी लड़ाई कौन लड़ेगा ?

जब तक हर नागरिक के लिये हिंदी पढ़ना ही नहीं उसमे प्रवीण होना आवश्यक नहीं होगा इंग्लिश ही वैकल्पिक भाषा रहेगी।  नार्थ में रहने वाले ज्यादातर लोग हिंदी , इंग्लिश दोनों भाषा का ज्ञान रखते हैं और अपनी रोजी रोटी के हिसाब से अपनी भाषा का चुनाव करते हैं पर बाकी जगह देश में ?



July 11, 2014

हाथ वाली कांग्रेस ने कब और कैसे इंडियन नेशनल कांग्रेस को हाई जैक करके अपने को इंडियन नेशनल कांग्रेस बना दिया इस पर एक समुचित इन्क्वायरी होनी चाहिये

सरदार पटेल की मूर्ति पर जो खर्च आएगा उसको लेकर तमाम फेसबुक स्टेटस पढ़ लिये। 
लोगो को लगता हैं ये गलत हैं लेकिन मुझे इसमे कुछ  गलत नहीं लगता
मुझे लगता हैं जरुरी हैं की बी जे पी ये सिद्ध करे की पटेल अन्य कई नेता " हाथ वाली कांग्रेस " की जागीर नहीं हैं . ये सब इंडियन नेशनल कांग्रेस से जुड़े थे और उस समय भारत में कोई भी और पोलिटिकल पार्टी नहीं थी जिसको आम जनता जानती और समझती हो।  " हाथ वाली कांग्रेस " का जन्म इंदिरा गांधी की वजह से हुआ था और ये इंडियन नेशनल कांग्रेस नहीं हैं .
हाथ वाली कांग्रेस के नेता तो बस इंदिरा , राजीव और संजय रहे  हैं यहां तक की अगर इतिहास को साक्षी माने तो नेहरू जी  का भी इस हाथ वाली कांग्रेस से कोई लेना देना नहीं था। 
हाथ वाली कांग्रेस ने कब और कैसे इंडियन नेशनल कांग्रेस को हाई जैक करके अपने को इंडियन नेशनल कांग्रेस बना  दिया  इस पर एक समुचित इन्क्वायरी होनी चाहिये