मेरे ब्लॉग के किसी भी लेख को कहीं भी इस्तमाल करने से पहले मुझ से पूछना जरुरी हैं

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January 20, 2016

केवल सिस्टम जिम्मेदार नहीं हैं और देश और सरकार तो बिलकुल नहीं हैं क्युकी देश स्थाई हैं सरकार चुन कर आती हैं।

किसी को उसकी लड़ाई हारते हुए देखने के बाद भी उसको लड़ते रहने के लिये , लड़ाई जारी रखने के लिये उकसाने से आप उसको उसकी हार को स्वीकार ना करने देने के दोषी हैं।  
जैसे लड़ाई के कई कारण होते हैं वैसे ही जीतने और हारने के कारण भी होते हैं।  समय और परिवेश का भी रोल होता हैं।  
ये जानते हुए की किसी की लड़ाई उसके लिये जीवन मरण का प्रश्न हैं न्याय और धर्म दोनों कहते हैं जीवन को चुनो।  खुद कृष्ण ने अपने लिये "रणछोड़" की उपाधि से उरेज नहीं किया था क्युकी अगर लड़ाई के लिये रहोगे ही नहीं तो लड़ोगे कैसे। 
चाणक्य ने भी यही कहा हैं की अगर समय और परिस्थिति अनुकूल ना हो तो पहले उसको अनुकूल बनाये और फिर अपनी लड़ाई चालू रखे।  

किसी को नेता बना कर उसको मरने के लिये उकसाने वाले भी उसकी आत्महत्या के लिये उतने ही उत्तरदाई हैं जितना वो सिस्टम जो सबको लड़ने के लिये मजबूर करता हैं।  

आत्महत्या करने वाला disillusioned होता हैं और जब ये डिसील्युशन अपने से होता हैं तो उसका युद्ध समाप्त हो जाता हैं और वो आत्महत्या करता हैं।  

अपने आप से उतनी ही आशा रखना जरुरी हैं जितनी हम पूरी कर सके।  और दुसरो को उकसाने से बेहतर होता हैं अगर हम उसको ये समझाए की अभी परिस्थिति अनुकूल नहीं हैं इस लिये अपने को और मजबूत बनाओ तब कर्म के युद्ध को आगे बढ़ाओ।  

जाति और धर्म के नाम पर उकसा कर युवा पीढ़ी को अलग अलग समय और स्थान पर मरने को मजबूर किया जा रहा हैं केवल देश और काल का अंतर मात्र हैं।  

कही  धर्म के नाम पर आत्मघाती बॉम्बर त्यार किये जाते हैं तो कहीं धर्म के नाम पर धरना और एनार्की को बढ़वा दिया जाता और युवा पीढ़ी मरने के लिये तत्पर हो जाती हैं।  कोई पेट्रोल डाल कर किसी कमीशन के साथ/ विरोध में आत्मदाह करता हैं तो कोई फांसी लगा कर।  

केवल सिस्टम जिम्मेदार नहीं हैं और देश और सरकार तो बिलकुल नहीं हैं क्युकी देश स्थाई हैं सरकार चुन कर आती हैं।  

कानून को ना मानना ही एक मात्र कारण हैं इस सब का।  कानून का विरोध कानून को मानने से ज्यादा होता हैं।  

डिसिप्लिन का महत्व अब रहा ही नहीं हैं।  

आप के आस पास अगर आग लगी हैं तो उसको बुझाने ने सहयोग करिये।  भड़काने से धुँआ उठाएगा जो प्रदुषण फैलाता हैं।  प्रदुषण मुक्त समाज ही सबको बराबर मान सकता हैं

January 18, 2016

अपने गाँव लौटना

अपनों के बीच में लौट सकना ही अपने देश या अपने गाँव लौटना होता हैं। जिसको अपना समझे और जो बिना प्रश्न किये आप के आते ही आप को एक गिलास पानी पिलाये। आप से कोई कारण ना पूछे की अब क्यों वापिस आये वही आप का गाँव या देश हैं। प्यार का अर्थ ही होता हैं अक्सेप्टन्स

January 16, 2016

पुस्तक मेले में

किताबे तो पहले भी बहुत सी छपती थी 
विमोचन लोकार्पण इतने कभी नहीं देखे 
विमोचन लोकार्पण के रैलो में 
पुस्तक मेले में 
मुझे पुस्तक प्रेम नहीं 
केवल और केवल आत्म मुग्धता ही दिखी
बड़ा साहित्यकार दिखने की होड़ मे
अच्छा साहित्य पढ़ने की इच्छा
कहीं दफ़न सी ही दिखी
तुमने मेरी खरीदी
तो मैं तुम्हारी खरीदूं
तुमने मेरी पढ़ी
तो मैं तुम्हारी पढूं
यही दिखता था सब जगह

January 14, 2016

बंद करिये एक बेहद गन्दी तरह परोसा हुआ खाना जीमना

एक सो कॉल्ड कॉमेडियन अरेस्ट हुआ अपने भोंडे मजाक के लिये। सवाल ये नहीं हैं की उसने किसका मजाक बनाया सवाल ये हैं क्या विद्रूप और भोंडापन किसी को कॉमेडियन बना देता हैं। पलक और गुथी का किरदार बना कर निरंतर स्त्रियों की शारीरिक संरचना पर कॉमेंट किये जाते हैं। दादी का किरदार भी इसी तरह का बन रहा हैं। और कपिल तो महिला पर आक्षेप करने में कितना नीचे गिर सकते हैं इसकी सीमा नहीं हैं।
कॉमेडी का मतलब क्या केवल भोंड़े मजाक , अश्लील डांस ही हैं। स्क्रिप्ट राइटर ने स्क्रिप्ट बना दी और एक सो कॉल्ड कमीडियन ने स्टेज पर जा कर उलटी कर दी हो गया शो।
२००९ का स्क्रीन अवार्ड याद आया जहां फराह और साजिद खान को झेलना पड़ रहा था तब आशुतोष ग्वारिकार ने मंच आपत्ति दर्ज की दी और उसके बाद अब २०१६ में फराह दुबारा किसी प्रोग्राम को होस्ट करती दिखी।
हास्य की समझ नहीं हैं ऐसे आक्षेप अक्सर लोग लगाते हैं अगर इन विषयों पर लिखो लेकिन हर विषय पर हा हा ही ही मुझे तो कभी रुचिकर नहीं लगी।
कोई भी प्रोग्राम हो करण जोहर के द्विअर्थी संवाद जरुरी हैं। भोंड़ेपन की परिकाष्ठा हैं। और ये सब किसलिये बकौल साजिद खान टी आर पी के लिये।
बंद करिये एक बेहद गन्दी तरह परोसा हुआ खाना जीमना और महिमा मंडित भी मत करिये उन सब को जिनके भोंड़ेपन के खिलाफ कार्यवाही की जाती हैं

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