आप ने अपना पक्ष रख कर मामला रफा दफा कर दिया । आप ने सही किया या गलत किया ये भी आप ने कह दिया आप का नज़रिया हैं । आप ने कहा कोई आप के परिवार का होता तो भी आप यही करते बस यही फरक हैं सोच का । ब्लोगिंग परिवार नहीं हैं । आप को जब मे २००७ मे ब्लोगिंग मे आयी थी बड़ा भाई कहा जाता था । आप के विरुद्ध जा कर मैने नीलिमा / ज्ञानदत/ खिचड़ी प्रसंग पर लिखा था और आप के परम मित्र जो आज कल सक्रिये नहीं हैं ने एक ब्लॉग पर जा कर मेरे ही नहीं मेरे माता पिता के भी विरुद्ध टिपण्णी की थी । उस समय ये प्रेम भाव क्यूँ जागृत नहीं था ??? उस समय आप ने कहा था "ज्ञान जी को मौज लेना नहीं आता " . ये सौहार्द केवल और केवल उस समय क्यूँ जागृत हुआ जब अमरेन्द्र जो की आप के ब्लॉग सहयोगी भी एक ब्लॉग पर इस प्रकरण मे आये । सब जानते हैं अमरेन्द्र और अरविन्द के बीच तनातनी हैं और आप और अमरेन्द्र आज कल बंधुत्व मे बंधे हैं । अगर बात केवल और केवल अरविन्द और दिव्या के बीच होती तो भी पोस्ट केवल दिव्या की ही डिलीट होती क्युकी सामजिक प्रतिष्टा का भय आप उसको ही दिखा सकते थे ।
बीच बाचाव करने की पक्षधर मे इस लिये नहीं हूँ क्युकी यहाँ बहुत से खेमे हैं और दूसरी बात यहाँ हर कोई बड़ा भाई बनने का इच्छुक हैं ऑनलाइन । इस पर दिव्या जी भी भड़क गयी हैं और ब्लॉग संसद ब्लॉग पर उन्होंने कह ही दिया हैं वो किसी की बहिन नहीं हैं । कही ये भी पढ़ा था की जो पोस्ट आप ने उनकी हटवाई उसको हटाने का भी उनको पछतावा हैं ।
आप सब के इस बीच बचाव प्रोग्राम मे कभी सतीश सक्सेना आप के और समीर के बड़े भाई बन जाते हैं और कभी आप किसी को परिवार का मान लेते हैं । यानी परिवार से हट कर ब्लोगिंग हैं ही नहीं । इतिहास दोहरा ले कम से कम मन मे और फिर देखे क्या इस "कपडा उतार " प्रक्रिया के लिये आप खुद कितने ज़िम्मेदार हैं ।
"वो अच्छी औरते नहीं हैं " ये मेरे और सुजाता के लिये इस्तमाल की जाने वाली tag लाइन हैं किसने दी सोचे ना याद आये गूगल करे । उम्मीद हैं इतिहास जो नेट पर हमेशा सुरक्षित हैं मिल जाएगा
और
कमेन्ट ना छापना चाहे कोई शिकायत नहीं होगी क्युकी ये कमेन्ट इस लायक है ही नहीं की मुआ छपे , इस को तो पोस्ट होना चाहिये था बिना लाग लपेट के !!!
हाँ
पोस्ट शानदार हैं दमदार हैं नमकीन हैं मीठी हैं
हा हा ही ही ठा ठा ठी ठी हैं कुछ भी नहीं ग़मगीन हैं
पंचम से सक्सेना को मारा हैं
कहीं पे निगाहे हैं
तो कहीं पे निशाना हैं
सच बोलना जितना मुश्किल है , सच को स्वीकारना उस से भी ज्यादा मुश्किल है . लेकिन सच ही शाश्वत है और रहेगा मुझे अपने सच पर उतना ही अभिमान है जितना किसी को अपने झूठ से होने वाले फायदे पर होता हैं
मेरे ब्लॉग के किसी भी लेख को कहीं भी इस्तमाल करने से पहले मुझ से पूछना जरुरी हैं
मेरे ब्लॉग के किसी भी लेख को कहीं भी इस्तमाल करने से पहले मुझ से पूछना जरुरी हैं
September 14, 2010
September 13, 2010
पाठक का महातम टिपण्णी से कहीं ऊँचा हैं ।
आज कल तुरंत पता चल जाता हैं की कितने लोगो ने पोस्ट को पढ़ा हैं । तुरंत यानी ईधर आप ने पोस्ट पुब्लिश की ऊधर डेशबोर्ड पर stat का button दबाते ही आकडे हाज़िर । इस के अलावा कौन कहा से आया ये भी पता चल जाता हैं ।
लोग टिपण्णी मिल या नहीं मिली या क्यूँ नहीं ली पर चर्चा कर रहे हैं लेकिन पाठक किस आलेख पर कितने आये और कितने पढ़ कर चले गये फिर आने के लिये पता नहीं देखते भी हैं या नहीं ।
पोस्ट पुब्लिश होने के ५ मिनट मे अगर ५ लोग आप को पढते नज़र आ आरहे हैं तो खुश हो जाईये क्युकी पाठक का महातम टिपण्णी से कहीं ऊँचा हैं ।
लोग टिपण्णी मिल या नहीं मिली या क्यूँ नहीं ली पर चर्चा कर रहे हैं लेकिन पाठक किस आलेख पर कितने आये और कितने पढ़ कर चले गये फिर आने के लिये पता नहीं देखते भी हैं या नहीं ।
पोस्ट पुब्लिश होने के ५ मिनट मे अगर ५ लोग आप को पढते नज़र आ आरहे हैं तो खुश हो जाईये क्युकी पाठक का महातम टिपण्णी से कहीं ऊँचा हैं ।
August 07, 2010
प्रेरणा और चोरी मे अंतर हैं
काफी समय पहले से हिंदी जाल पर दूसरो कि पोस्ट को अपनी कह कर हिंदी जाल पर ब्लॉग लिखे जा रहे थे । तब उनकी भर्त्सना खुले मन से होती थी ।
आज ३ साल बाद देखने मे आ रहा हैं कि एक ब्लॉगर निरन्तर अखबारों से और किताबो से भारतीये संस्कृति , नारीवाद और ना जाने कितने विषयों पर लिखे आलेखों को सीधा सीधा टीप कर अपने ब्लॉग पर डाल रहा हैं और लोग उसकी पीठ थप थापा रहे हैं ।
उसकी पिछली दो तीन पोस्ट मे वो कमेन्ट भी हटा दिये गए हैं जो उन लिनक्स कि और इंगित करते हैं जहा ओरिजिनल आर्टिकल हैं ।
क्या हम सही करते हैं ऐसे लोगो को उर्जावान कह कर जो जान कर अपने को इंटेलिजेंट साबित करना चाहते हैं । जिस उम्र मे उनको अपनी जीविका के साधन जुटाने चाहिये उस उम्र मे वो चोरी कर रहे हैं ।
कमाल हैं ,
नाम देने कि जरुरत आज महसूस नहीं हो रही पर शीघ्र ही दूंगी
प्रेरणा और चोरी मे अंतर हैं , ओरिजिनल लेखक का नाम देना और लिंक देना जरुरी हैं
आज ३ साल बाद देखने मे आ रहा हैं कि एक ब्लॉगर निरन्तर अखबारों से और किताबो से भारतीये संस्कृति , नारीवाद और ना जाने कितने विषयों पर लिखे आलेखों को सीधा सीधा टीप कर अपने ब्लॉग पर डाल रहा हैं और लोग उसकी पीठ थप थापा रहे हैं ।
उसकी पिछली दो तीन पोस्ट मे वो कमेन्ट भी हटा दिये गए हैं जो उन लिनक्स कि और इंगित करते हैं जहा ओरिजिनल आर्टिकल हैं ।
क्या हम सही करते हैं ऐसे लोगो को उर्जावान कह कर जो जान कर अपने को इंटेलिजेंट साबित करना चाहते हैं । जिस उम्र मे उनको अपनी जीविका के साधन जुटाने चाहिये उस उम्र मे वो चोरी कर रहे हैं ।
कमाल हैं ,
नाम देने कि जरुरत आज महसूस नहीं हो रही पर शीघ्र ही दूंगी
प्रेरणा और चोरी मे अंतर हैं , ओरिजिनल लेखक का नाम देना और लिंक देना जरुरी हैं
July 25, 2010
माँ के हाथ कि बनी घुईयाँ की रसेदार सब्जी रोटी और doctored comments
जापान से वापिस आकर अपना देश और अपने देश का खाना बहुत अच्छा लगा । चावल और बन खा खा कर तबियत उकता गयी थी । माँ के हाथ कि बनी घुईयाँ की रसेदार सब्जी और रोटी खा कर लगा कुछ खाया ।
कल से फिर रेगुलर रोटीन का काम शुरू
आज एक ब्लॉग पर एक बनारसी बाबू कि ब्लॉग पर आये कमेंट्स कि सचाई पता चली । क्या वाकयी लोग कमेंट्स
को docter करवा सकते हैं । उफ़ कमेंट्स के लिये क्या क्या करते हैं
नाग नागिन केचुल बदलते हैं सही हैं काश ये सुविधा कुछ इंसानों को भी मिली होती कम से कम वो गंदगी से निजात पा सकते थे ।
कल से फिर रेगुलर रोटीन का काम शुरू
आज एक ब्लॉग पर एक बनारसी बाबू कि ब्लॉग पर आये कमेंट्स कि सचाई पता चली । क्या वाकयी लोग कमेंट्स
को docter करवा सकते हैं । उफ़ कमेंट्स के लिये क्या क्या करते हैं
नाग नागिन केचुल बदलते हैं सही हैं काश ये सुविधा कुछ इंसानों को भी मिली होती कम से कम वो गंदगी से निजात पा सकते थे ।
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